ऐसी अक्षरे

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मंदार शिंदे
Mandar Shinde

Saturday, January 16, 2010

बंधन

आसमाँ ने कहा जमीं से,
तू मेरे आगे कुछ भी नही,
मैं कभी नही मिलूँगा तुझसे
मुझे तेरी जरुरत नही।
जमीं से रुठकर आसमाँ ने
उठा लिये अपने पर
और फैला दिये हवाओं में
ढूँढने कोई नया हमसफर।
सारे जहाँ में कोई न मिला
तो थक गया आसमाँ भी,
सिमट गया फिर वो विशाल
दूर कहीं जमीं पर ही।
मन ही मन मुस्काई धरती
उसके दिल को भी चैन आया,
चाहे जो कहे सुबह का भूला
शुक्र है शाम को लौट आया॥

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बुझने से डरना...

बुझने से डरना, नही शमा का काम
अंधेरे का अंजाम, है रोशनी के नाम,
वक्‍त ही बतायेगा, किसने की बेवफाई
हम तो छलकाते जायेंगे, मोहब्बत के जाम...

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ना नींद आती है...

ना नींद आती है ना चैन आता है,
दिल में कुछ सोचूँ तो उनका खयाल आता है,
बात दिल तक थी तो ठीक था यारों,
अब तो जुबाँ पे भी सिर्फ उन्हीका नाम आता है...

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आपसे मिलने की ख्वाहिश...

आपसे मिलने की ख्वाहिश दिल में लिये,
आपको देखने का अरमाँ आँखोंमे लिये,
अब तो साँस लिया करते है हम,
आप की यादों का सहारा लिये...


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